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क्या आपने भी किराये की आमदनी के लिए प्रॉपर्टी खरीदी है

सवाल :- मेरी बिज़नेस/ प्रोफेशन से आय आज अच्छी है पर हो सकता है की समय के साथ वह कम हो जाये , तो मैंने प्रॉपर्टी खरीद कर उस से आने वाली आय से अपनी दूसरी आमदनी बनाने की व्यवस्था की है , क्या यह सही प्लानिंग है ? जवाब :- तीन बातों को समझ लेना बहुत जरुरी है ,
पहला बात :- कैसी भी संपत्ति आप को सिर्फ तीन प्रकार से ही लाभ दे सकती है , पहला लाभ वर्तमान मैं नियमित आय ( उदाहरण :- बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट से मिलने वाला ब्याज ) ,दूसरा लाभ नियमित आय व संपत्ति की कीमत मैं वृद्धि ( उदाहरण :-शेयर्स व उनसे मिलने वाले डिविडेंड , किराये पर चढ़ी प्रॉपर्टी ), तीसरा लाभ सिर्फ कीमत मैं वृद्धि ( उदाहरण :- सोना, चाँदी, या उपयोग मैं न ली गयी जमीन )
दूसरी बात :- आय पर दो प्रकार से टैक्स लगता है जैसे वर्तमान आय (ब्याज , किराया ) पर इनकम टैक्स, वा विलंबित आय पर कैपिटल गेन टैक्स जो की शेयर , जमीन आदि पर मिलने वाले लाभ पर लगता है , अब आपके लिए वर्तमान आय पर लगने वाला टैक्स सबसे ख़राब है , क्योकि आप पहले से ही उच्च आय की श्रेणी मैं आते हैं ,तो आपके लिए सबसे सही निर्णय यही होना चाहिए की आप अपनी वर्तमान आय को भविष्य की आय मैं परिवर्तित करने की प्लानिंग करें ,
तीसरी बात :- तो आपके लिए सबसे सही निर्णय होना चाहिए , १)शेयर्स मैं निवेश , अथवा इक्विटी म्यूचअल फंड्स मैं निवेश ,क्योकि इससे मिलने वाले डिविडेंड्स भी टैक्स फ्री होते हैं तथा लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स भी नहीं लगता . और अगर आपको शेयर मार्केट जोखम पूर्ण लगता है, तो आप को निवेश करना चाहिए Debt म्यूचअल फंड्स मैं जिससे आप बाजार के जोखिम से भी बचते हैं और कैपिटल गेन टैक्स पर भी Indexation का लाभ ले पाते हैं , फाइनेंसियल प्लानिंग एक व्यापक विषय है ,और यह आपके जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव डालता है , आपके आर्थिक लक्ष्यों की जिम्मेदारी आपकी है न की आपके CA या LIC एजेंट की , तो इस जिम्मेदारी अपने हाथों मैं लीजिये आर्थिक विषय पर अपना ज्ञान बढ़ाइये , आर्थिक विषयों पर हमारी मासिक पत्रिका " Money and Thoughts " के सदस्य बनने के लिए आप मुझे कॉल ,sms ,या Whatsup कर सकते हैं .

धन्यवाद्
भरत सिंह



आपके निवेश की सबसे बड़ी दुश्मन :- महंगाई दर

हम भारतीय पारंपरिक रूप से बचत करने में विश्व के अग्रणी समाजो में से एक है। एक अनुमान के मुताबिक Bank F.D., Post Office, Insurance Policies, Gold आदि खरीदने में आम भारतीयो की 24%-28% प्रतिशत मासिक आमदनी निवेश होती है। और इस गणित के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बचत शुरू करने के 20 वर्षो के बाद आर्थिक स्वतंत्रता मिल जानी चाहिए। अर्थात यदि कोई व्यक्ति 25 साल से अपनी मासिक आय का 25% बचत करना शुरू करता है तो 45 वर्ष का होते-होते उसे अपनी जीविका कमाने के लिए श्रम करने की आवश्यकता नहीं रहनी चाहिए, उसकी पिछले 20 सालो की बचत ही उसकी जीविका चलाने के लिए पर्याप्त होनी चाहिये। ”परंतु ऐसा होता नहीं है।..... क्यों?”
अक्सर हम अखबारो में इस प्रकार की खबरें पढते है ”मुद्रास्फिती की दर 8% हुई” ” Inflation rate has crossed 3 months average .ß” हम में से अधिकांश लोग इसे पढ कर अपने व्यवहारिक जीवन से नहीं जोड पाते। कि हमारे जीवन पर इसका क्या प्रभाव पडता है। सामान्य भाषा में मुद्रास्फिती का बढना हमारी रोजमर्रा की जरूरतों का महंगा होना दर्शाता है।
पर चीजों के दाम क्यों बढतें है?
क्योंकि उत्पादित वस्तुओ की तुलना में अधिक मुद्रा ( पैसे ) लगातार अर्थव्यवस्था में डाली जा रही है जो रूपये की कीमत को कम करती है इसे हम सामान्य मांग और आपूर्ति के नियम से समझ सकते हैं। ‘महंगाई ,(मुद्रास्फिती की वजह से हमारे नोट अपनी कीमत खोते जा रहे हैं।
उदाहरण
आज से 15 साल पहले जब मैने अपने जीवन की पहली मूवी थियेटर में जा कर देखी थी तो उस समय मेरा कुल 15 रूपये खर्चा आया था। आज 15 साल बाद जब मै किसी माॅल में मूवी देखने जाता हॅू तो मेरा खर्चा करीब 225/- रूपये होता है तो मेरे लिये पिछले 15 सालो में मूवी देखने का खर्चा 15 गुना हो गया है। ‘यह आम आदमी के लिए मुद्रास्फिती है‘। एक और उदाहरण से यह स्पष्ट हो जायेगा। मान लीजिए मेरे पास 100 रूपये है और मान लीजिये कि मै इस 100 रूपये से एक दर्जन सेब खरीद सकता हॅू, पर मुझे आज ये सेब नही खरीदने चाहता हूँ मैं चाहता हूँ अगले साल ये सेब इसी 100 रूपये से खरीदू । तो मैने 100 रूपये की F.D. बैंक में बनवा दी 8% के ब्याज से। अब एक साल बाद मेरे पास 108 रूपये है। लेकिन पिछले साल मुद्रास्फिती 10% से बढ गई, मतलब सामान्य खाने पीने की चीजो की कीमत में 10% बढोत्तरी हो गई तो इस दर्जन सेब की कीमत अब 110/- रूपये हो गई, अब एक साल के बाद अपने 100/- रूपये की FD कराने के बावजूद मुझे 2/- रूपये अपनी जेब से और देने पडेंगे वही एक दर्जन सेब खरीदने के लिये और यही अगर 10 साल बाद में एक दर्जन सेब खरीदने जाऊ तो हो सकता है कि मुझे एक सेब के 100/- रूपये देने पडे। इस प्रकार महंगाई हमारी बचत को खा जाते है यदि हम अपने निवेश समझदारी पूर्वक नहीं करते। निवेश करते समय की जाने वाली गलतियां !
हम में से अधिकांश लोग निवेश करते समय महंगाई दर का आंकलन नहीं करते, और सिर्फ Rate of Interest को देखकर अपना निवेश करते है। और इस प्रक्रिया में हम में से अधिकांश लोगो की वही स्थिती होती है जो ऊपर दिये गये उदाहरण में स्पष्ट है। जो भी Rate of Interest/Rate of Return आप देखते या पढते है वह वास्तविक Return/Interest नहीं माना जा सकता है जब तक हम उसमें महंगाई दर की गणना नहीं जोडते है।
शायद इसीलिये Inflation महंगाइ को अर्थशास्त्री अंग्रेजी में Silent Monster ,खामोश राक्षस भी कहते है। यदि हमारा निवेश समझदारी पूर्वक नहीं हुआ तो हम सभी का कमाया हुआ धन इस खामोश राक्षस के पेट में जाता रहेगा, और अपनी जी तोड मेहनत और निरंतर बचत की अच्छी आदतों के बावजूद हमारी आर्थिक स्थिती खराब ही रहेगी। इसीलिये अगली बार निवेश करने से पहले इस formula का उपयोग अवश्य कीजिये। सरकार द्वारा जारी ‘महंगाई दर‘ एक व्यापक गणना है जिसमें बहुत सारी वस्तुओं का समावेश होता है परंतु यदि हम इसका विस्तार से अध्ययन करेंगे तो पायेंगे कि यह अलग-अलग व्यक्ति समूहों पर अलग प्रभाव डालती है। कुछ वस्तुयें जैसे खाद्य पदार्थ, ईंधन आदि सभी लोगो को प्रभावित करते हैं तो दूसरी ओर शिक्षा खर्चो में होने वाली वृद्धि उन लोगों को प्रभावित करती है जिनके बच्चे अभी छोटे हैं इसी प्रकार दवाई की कीमत से होने वाली वृद्धि बुजुर्ग लोगों को अधिक प्रभावित करती है। केस स्टडी (Case Study) आइये हम राकेश का उदाहरण लेते है राकेश की एक साल की बेटी है और वह अपनी बेटी को MBA कराना चाहता है जब उसकी बेटी 21 साल की हो जायेगी । तो अजय के पास अभी 20 साल का वक्त है अपनी बेटी की Education की व्यवस्था करने के लिये, आज MBA । कराने का खर्चा करीब 4 लाख रूपये है और यही हम शिक्षा में मूल्य वृद्धि 8% माने तो यही MBA करने के लिये 20 साल बाद खर्चा होगा 18,64,382/- रूपये। अब प्रश्न यह है कि अपनी बेटी की शिक्षा का खर्च उठाने के लिये राकेश आज से कितनी बचत शुरू करे और किस उपकरण में। विकल्प
यदि राकेश प्रति माह 2046/- रूपये किसी भी ऐसी स्कीम में डालता है जो 12% सालाना return देती हो तो बीस वर्षो में वह अपने लक्ष्य को हासिल कर लेगा। यह जादू चक्रवर्ती ब्याज, compounding return का है जो 20 सालो मे इस विशाल लक्ष्य को पूरा कर सकता है। अगर राकेश का निवेश किसी ऐसे उपकरण में हो जो उसे सालाना 15% का रिटर्न दे तो उसकी मासिक बचत कम हो कर 1421/- रह जायेगी। शेयर एतिहासिक रूप से शेयर लम्बे समय तक निवेश करने पर 15% से ऊपर का रिटर्न देते है। अगर राकेश बिल्कुल भी जोखिम न लेने वाला निवेशक है तो Public Providend Fund के माध्यम से अगर वह निवेश करता है जो उसको 8% की गारंटी देता है तो उसकेा मासिक 3276/- बचाने पडेंगे।



क्या शहरी भारत रियल स्टेट के बुलबुले पर सवार है?

हम में से काफी लोगों ने अमेरिका में कुछ साल पहले आई आर्थिक मंदी के बारे में सुना होगा। विशेषज्ञों ने उसका नाम रखा था,SUB PRIME CRISIS एक ऐसी मंदी जिसने लगभग पूरे विश्व को अपने प्रभाव में ले लिया और अमेरिका से लेकर यूरोप तक के बडे-बडे वित्तीय संस्थांन दिवालिया होने की कगार पर आ गये।
पर क्या हम लोग जानते है कि यह वित्तीय संकट अचानक प्रकट कहां से हो गया। शायद नहीं !
अमेरिकी REAL ESTATE में आई असंतुलित तेजी इस संकट का मुख्य कारण थी जिसके कुछ लक्षण आज के भारतीय Real Estate Market से मिलते जुलते है।नीचे कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु है जो अमेरिकी आर्थिक त्रासदी के पहले अमेरिकी समाज में दिखने लगे थे इसकी तुलना आप भारतीय परिवेश से अपने हिसाब से कर सकते है।

1. जरूरत से अधिक उधार:- तेजी के चरम पर ऐसे कई लोगो से आप मिलते है जिन्होने अपनी हैसियत से ज्यादा लोन ले रखा होगा तथा जिनके पास दो-तीन प्रोपर्टीज होगी बैंक लुभावने ब्याज और सुलभ लोन प्रक्रिया की Marketing करके व्यक्तियों को उनकी क्षमता से अधिक लोन मुहैया करवा देते है।
2 संगी साथियों का दबाव:- जब REAL ESTATE का बुलबुला पूरा स्वरूप ले लेता है तो आप पार्टियों में, क्लबों में, रिटेल शाॅप पर, सभी जगह सिर्फ REAL ESTATE की बातें सुनते है। जब हमारा कोई साथी अपनी नई खरीदी प्राॅपर्टी के बारे में बताता है या रिश्तेदार अपने नये फ्लैट की पार्टी देता है तो हम मनोवैज्ञानिक रूप से उस ओर आकर्षित होेने लगते है जो इस तेजी को ओर गति प्रदान करता है।
3 REAL ESTATE की कीमतें न गिरने का भ्रम:- अधिकांश लोग इस भुलावे में रहते है कि REAL ESTATE की कीमतें कभी भी नहीं गिर सकती। वे दूसरे उदाहरणों को स्वीकार नहीं करते, वे स्वयं को इस बाजार का Expert समझने लगते है तथा उनकी सोच से अलग कोई सलाह उनके अहंकार को चोट पहुचाती है। ;वास्तविकता में उनकी स्थिति शेयर बाजार की तेजी के दौर में दाखिल हुए नये निवेशक जैसी होती है जिसका हर दाब सही पडता है क्योंकि पूरा शेयर बाजार ऊपर चढ रहा होता है उसकी हर खरीद उसे मुनाफा देती है और वह स्वयं को बाजार का विश्लेषक समझने लगता है।
प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना आवश्यक है कि Risk - Return का बहुत पुराना साथ है और हमें इतिहास से सबक लेकर अपने वर्तमान तथा भविष्य की योजनाओं पर विचार करना होगा। आज वैश्विक अर्थव्यवस्था के दौर में हम सभी आपस में जुडे हुये है एक देश दूसरे देश से, एक समाज दूसरे समाज से, अतः जो गलतिया किसी दूसरे देश में हुई उनके प्रति भी हमें सजग रहना होगा तभी हम स्वयं को सम्पन्न तथा विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित कर पायेेंगे।



रिलेशन शिप मेनेजर (खतरे की घंटी )

एक दुखी ग्राहक की व्यथा :- ,जब भी मेरा रिलेशनशिप मेनेजर मुझे फ़ोन करता है उसका सबसे बड़ा मकसद होता है मुझे एक नयी बीमा पालिसी चिपकाना ( बेचना )
अगर आपके अनुभव भी कुछ ऐसे ही हैं तो आगे पढ़िए !!!!
आज के दौर मैं बैंकों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा तथा बीमा कंपनियों से मिलने वाले मोटे कमीशन के लालच ने बैंकों मैं एक नयी प्रकार की सेल्समनो की खेप तैयार की है जो बाहर से तो बैंकर दिखाई देते हैं पर जिनकी नौकरी सिर्फ वित्तीय उत्त्पादों और खास तौर पर बीमा पॉलिसियों की सेल पर आधारित होती है और इन पर अपने टारगेट पुरे करने का इतना अधिक दबाव रहता है की ग्राहक की आर्थिक स्थिति या लाभ- हानि इनकी प्राथमिकताओं मैं बहुत पीछे आते हैं
रिलेशनशिप मैनेजरों को बैंक अक्सर अपने मोटे (जिनकी आमदनी अच्छी हो ) ग्राहकों के साथ जोड़ देता है , ग्राहक को बताया जाता है की ये रिलेशन शिप मेनेजर आपको विशेष सुविधा देने के लिए है ,ताकि आपकी बैंकिंग सुविधाजनक हो सके , पर वास्तव मैं ये आपको ज्यादा से ज्यादा बीमा पालिसी बेचने के लिए रखे जाते हैं , ये ज्यादातर मार्केटिंग मैं MBA किये हुए युवा होते हैं जिनको बैंक की सेल्स बढ़ाने के लिए रखा जाता है
इन लोगों के पास ग्राहक के बैंक खाते की पूरी जानकारी रहती है , इनको अच्छे से पता होता है की कब आपके खाते मैं कितना पैसा है और अक्सर ये उसी वक्त आपको फ़ोन करते हैं जब इनको पता होता है की आपके खाते मैं इतना पैसा हो की आप पैसे की कमी का बहाना न बना पाएं .
एक और बड़ी समस्या है की ये रिलेशनशिप मेनेजर बार बार अपनी नौकरी बदलते रहते हैं ,तो जब तक ग्राहक समझ पाए की उसे गलत पालिसी बेच दी गयी है अक्सर वो रिलेशन शिप मेनेजर नौकरी छोड़ चुका होता है . और अब ग्राहक के पास उस मेनेजर को मन ही मन गाली देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता.



डॉक्टरों की फाइनेंसियल प्लानिंग से जुड़े 5 नियम

नमस्कार
पिछले कुछ सालों मैं अलग अलग डॉक्टरों के साथ हुई मेरी चर्चाओं व् उनकी फाइनेंसियल प्लानिंग से निकले कुछ महत्वपूर्ण नियम जो आमतौर पर लगभग सभी डॉक्टरों पर लागू होते हैं

१ सामान्यतया डॉक्टरों के पास कोई दूसरी आय का स्रोत नहीं होता ,और बहुत ही कम डॉक्टर्स के पास पेंशन की व्यवस्था होती है , साथ ही हमारे देश मैं कोई सोशल सिक्योरिटी (सामजिक सुरक्षा ) जैसी व्यवस्था भी नहीं है , तो अगर आपके निवेश सही नहीं हुए , और आप 80 साल तक जीवित रहते हैं आप को 77 की उम्र तक काम करना पड़ सकता है .
२ मेडिकल संबंधी शिक्षा तो आप लेते ही रहते हैं ,उसी तरह फाइनेंसियल प्लानिंग से जुडी अपनी जानकारी भी बढ़ाते रहिये .निवेश का मतलब सिर्फ LIC की पालिसी ,बैंक की FD , और रियल इस्टेट नहीं होता .
३ सभी प्रकार के जोखिमों से बचने के लिए सही बीमा पालिसी जरूर ख़रीदिये ,जैसे टर्म लाइफ इन्सुरेन्स , मेडिकल इन्सुरेन्स ,प्रोफेशनल इन्डेम्निटी इन्सुरेन्स,मालप्रैक्टिस इन्सुरेन्स,डिसेबिलिटी इन्सुरेन्स ,,और हाँ ,,बीमा एक गतिशील विषय है , तो अपने बीमा राशि की समय समय पर समीक्षा करते रहिये .
४ आपका उद्देश्य सिर्फ टैक्स बचाना ही नहीं ,बल्कि टैक्स स्थगित करना भी होना चाहिए , यह काम अक्सर अच्छे C A भी नहीं कर पाते, तो इस को समझीये और अपने C A से कहिये की वह आपकी आज की आय को भविष्य के कैपिटल गेन मैं परिवर्तित करे .
5 अपनी सम्पतियों की सुरक्षा का प्रबंध कीजिये , अपनी वसीहत बनवाइए ,अपने सारे निवेशों से जुड़े कागजों को व्यवस्थित कीजिये , आज ही !!



राजकोषीय घाटा क्या है तथा हमें कैसे प्रभावित करता है।

जो लोग अंग्रेजी अखबार पढने के शौकीन है या जो NDTV Profit, Zee Business आदि देखने मे थोडी बहुत दिलचस्पी रखते है वे अमूमन इस शब्द से रूबरू हुए ही होंगे जिसे Fiscal Deficit या हिंदी में राजकोषीय घाटा कहा जाता है।
Fiscal Deficit सरकार द्वारा आय से अधिक खर्चे को दर्शाता है। सरकार की आय के मुख्य साधन Direct तथा Indirect Tax होते है, जब सरकारे इन आय के स्त्रोतो से प्राप्त धन को पूरा खर्च कर लेती है तब वह RBI तथा अन्य माध्यमों से पैसा इकट्ठा करती है।
यहा गौर करने योग्य बात है कि वर्तमान स्थिति में सरकार का 70% खर्चा (Revenue expenditure) में हो रहा है जिसमें सरकारी कर्मचारियों की तन्ख्वाह, कारो के लिये पेट्रोल, बोनस, एसी, सरकारी बंगलो की बिजली का बिल तथा नेताओ तथा बडे अधिकारीयो की सुविधा के लिये किये जाने वाले तमाम खर्चे शामिल है तथा 30% पैसा capital expenditure के रूप में खर्च किया जाता है जिससे सडक, पुल आदि के निर्माण के लिये निदके धनराशी उपलब्ध होती है। पिछले वर्ष हमारे देश का Fiscal Deficit Rs 5.01 lakh crore था।
अब बडा सवाल यह उठता है कि इससे हमारी आम आदमी की जेब पर क्या असर पडता है।
1. महंगाई की मार:- जब सारा पैसा खर्चा करने के बाद सरकारे Reserve बैंक से पैसा लेती है तो इनकी पूर्ति बैंक अधिक नोट छापकर करता है जिससे अधिक मुद्रा/पैसा हमारे बाजारों में आ जाता है जो वस्तुओं की किमतो को तेजी से बढा देता है।
2. महंगे लोन:- जब महंगाई अधिक बढती है तो Bank ब्याज दरे बढा देता है जिससे आम व्यक्ति को अपने लोन पर ज्यादा ब्याज देना होता है।
3. नौकरियों में कटौती:- जब ब्याज दरें बढती है तो बडे औद्योगिक समूह भी बडे हुये ब्याज की वजह से अपने खर्चो में कटौती करते है तथा कर्मचारियों की छटनी इसका एक बढा माध्यम होता है।
सारांश:- अक्सर हम लोग सिर्फ अपने पारिवारिक बजट तथा व्यक्तिगत लाभ-हानि के विषयों पर चर्चा तथा विचार करते है परंतु सरकारी बजट की स्थिति पर ध्यान नहीं देते जबकि हमारी व्यक्तिगत लाभ हानि के पूर्वानुमान लगाने में यह एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। राष्ट्र के घटक होने के नाते राष्ट्रीय समस्याएँ हमारे व्यक्तिगत जीवन पर भी भारी प्रभाव डालती है।



बीमा पाॅलिसी, में धोखा खाने से कैसे बचें

पिछले काफी समय से हम लोग एसे अनेक ग्राहकों से मिले है जो किसी ना किसी रूप में अपने वित्तीय उत्पादों विशेषकर बीमा पाॅलिसियों से असन्तुष्ट है। अथवा स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते है अधिकांश केसों में हमने पाया कि गलत तरीके से बेचा तथा खरीदा वित्तीय उत्पाद इस समस्या की जड है।
जिसकी वजह से एक ओर ग्राहक समुदाय में कुछ विशेष उत्पादों के प्रति नकारात्मकता आती है वहीं दूसरी ओर अच्छे एजेंट तथा sales man को भी शंका की दृष्टि से देखा जाने लगता है।
यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि ग्राहक की आर्थिक क्षेत्र में कम समझ इसका सबसे बडा कारण है यदि ग्राहक कुछ मूलभूत जानकारियां अपने पास रखे तो कम संभावना है कि वह किसी गलत Agent के झासे में आये।
आइये जाने कि कौन से एसे वाक्य है जो आपको गलत निवेश के प्रति आकर्षित करने में उपयोग किये जाते है।
सर , 3-5 साल के बाद आपको इस पाॅलिसी में प्रीमियम देने की जरूरत नहीं है।
यह वाक्य ग्राहक के ऊपर जादुई प्रभाव डालता है। हम भारतीय निवेशक खुद को आजाद महसूस करने लगते है, यदि जीवन बीमा की प्रीमियम सिर्फ 5 साल के लिये हो। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना है कि ULIP में यदि कोई चाहे तो 5 साल से पहले भी प्रीमियम देना बंद कर सकता है। 5 साल सिर्फ lock in period की अवधि है। दूसरा ULIP में किसी को कम समय निवेश के लिये सलाह देना नैतिक रूप से गलत है क्योंकि इन उत्पादो का निर्माण लम्बी अवधि तक लगातार निवेश करने वाले ग्राहको के अनुसार किया गया है तथा इसको कम अवधि के लिये बेचना सैद्धांतिक रूप से गलत है, जिसका हर्जाना ग्राहक को भरना पडता है।
सर मै आपके पहले साल के प्रीमियम का 20% पैसा आपको कैश वापस पर दूंगा।
कैसी विडम्बना है हम लोग अपने ही पैसे को वापस पाकर बहुत खुश हो जाते है और फिर पाॅलिसी के बारे में पूछने का भी प्रयत्न नहीं करते। हमको यह बडी समझदारी भरा फैसला लगता है कि पाॅलिसी भी ले ली और 20% पैसा भी वापस ले लिया। पर वास्तविकता में जो पैसा आपको मिला है वह आपका ही है परंतु अब अगले 15-20 साल तक आप उस गलत पाॅलिसी से आजाद नहीं हो पायेंगे।
वैसे IRDA के नियमो के अनुसार कमीशन वापस करना अथवा मांगना दोनो ही अपराध है।
सर यह पाॅलिसी आपको 250% रिटर्न देती है।
कंपनी वाले बडे समझदार लोग होते है। वे जानते है कि गारंटिड, निश्चित, लिख के देंगे आदि शब्द भारतीय ग्राहको को आकर्षित करते है और खासतौर पर जब शेयर बाजार अच्छा नहीं चल रहा हो तब इस प्रकार के उत्पाद आम जनता को बडे लुभावने लगते है परंतु यदि आप किसी भी एजेंट से इसका (IRR) Internal Rate of Return पूछेंगे तो वे अपनी बगलें झांकते नजर आयेंगे।
सर यह सबसे ज्यादा बिकने वाला Product है आपके परिचित शर्मा जी ने भी लिया है।
हम सभी के ऊपर एक भीडतंत्र हावी है, जैसे किसी सभा में आप सबके ताली बजाने पर अपने आप ताली बजाने लगते है वैसे ही हम सभी को लगता है कि अगर बाकी सब ने लिया है तो सही ही लिया होगा और हम बिना जानकारी लिये वह पाॅलिसी करा लेते है।
कितने आश्चर्य की बात है हम लोग अपनी पूरी जिंदगी पैसा कमाने में लगा देते है पर उसी पैसे को निवेश कैसे करना है यह सीखने के लिये दिन भर में 5 मिनट नहीं निकाल पाते। आश्चर्य है कि हम आज भी अपना निवेश विश्वास के आधार पर करते है जानकारी के आधार पर नहीं और यही कारण है कि आज तक हम अच्छे निवेशक नहीं बन पाये।



अगर आप आर्थिक स्वतंत्रता चाहते हैं तो ये कीजिए

आज की तेज़ जीवन शैली मैं व्यस्त हम मैं से कई लोगों के मन मैं अक्सर यह विचार घूमता है की क्या कभी वे अपने जीवन मैं आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कर सकते हैं या फिर क्या जीवन भर उनको अपनी आर्थिक मजबूरियों से दबकर समय काटना होगा.
आर्थिक स्वतंत्रता एक ऐसा लक्ष है जो अमूमन हर व्यक्ति देखता है ,कुछ लोग द्रढ निश्चय कर इस ओर प्रयास करते हैं और कुछ के लिए एक सपने की तरह है.
आइए देखते हैं कुछ आसान नियम आर्थिक स्वतंत्रता पाने के

1) बचत बचत बचत :- जी हाँ , आप शुरुआत कर सकते हैं अपनी मासिक आमदनी की 10 % बचत की शुरुआत से , हर साल इसे 10% बढ़ते जाएँ ,और इसको बढ़ा कर 50% तक करने का लक्ष रख लीजिए . इस टारगेट को हासिल करने के लिए इस साधारण समीकरण का उपयोग कीजिए (आमदनी - बचत = खर्चा )
2) आपातकालीन कोष बनाइए :- अपने 6 महीने के घरलू खर्च के बराबर राशि को हमेशा अपने किसी बैंक अकाउंट अथवा लिक्विड म्यूचुयल फंड मैं डालकर रखिए . किसी भी कीमत पर यह राशि किसी नयी कार अथवा किसी अन्य प्रकार का समान खरीदने मैं खर्च ना करें . यह कोष आपको नौकरी छूटने या किसी अन्य प्रकार के आर्थिक संकट के समय मैं सहायता प्रदान करेगा
3) टर्म प्लान खरिदिये :- अगर आपके परिवार मैं आप पर २-३ लोग आश्रित हैं तो यह सुनिश्चित कीजिए की आप के पास एक अच्छा टर्म प्लान हो , कम से कम १ करोड़ के बीमा धन का.
4) ई म आई पर नियंत्रण रखिए:- कभी भी अपनी मासिक ई म आई को अपनी मासिक आय के 25 -30 % से अधिक ना होने दें
5) सोच समझ कर उधार लें :- कभी भी ऐसी किसी चीज़ के लिए लोन ना लें जो सिर्फ़ आप को आपके दोस्तों व रिश्तेदारों को अपनी हैसियत का दिखावा करने मैं उपयोगी हो, लंबी कार खरीदने का निर्णय अक्सर इसी मानसिकता का परिणाम होता है.
याद रखें कोई सेल्स मेन आपसे कुछ भी कहे पर उधार कभी मानसिक शांति नही लाता



बीमा कंपनी अब आपका क्लेम अस्वीकार नही कर सकती

यदि आपने टर्म प्लान (Term Plan ) खरीद लिया है या खरीदने का विचार आप के मन मैं है तो ये खबर आप के लिए ही है
आप को यह जान कर खुशी होगी की IRDA के नये निर्देशों के अनुसार अब कोई भी बीमा कंपनी किसी भी दावे को अस्वीकार नही कर सकती यदि वह पॉलिसी 3 साल या उससे अधिक चल चुकी हो ,
IRDA का यह निर्णय Insurance Act 1938 की धारा 45 का संशोधन है , जिसके तहत बीमा कंपनी को दावा निरस्त करने का अधिकार था , यह अधिकार कंपनी को ग्राहकों द्वारा ग़लत जानकारी ,अप्रकटिकरन आदि की स्थितियों मैं निर्मित दावों को निपटने मैं दिशानिर्देश देता था
पर अब IRDA के अनुसार बीमा कंपनिओ को 3 साल के अंदर सब तथ्यो की जाँच पड़ताल करके ग्राहक द्वारा दी किसी भी प्रकार की ग़लत जानकारी का पता लगाना होगा यदि इन 3 सालों के भीतर कंपनी किसी प्रकार का ग़लत बयानी अथवा अप्रकटिकरन का पता नही लगा पाती है तो वह दावा अस्वीकार नही कर पाएगी.
तो अब आपको कंपनी के दावा निपटने की दर (Claim settlement Ratio )चेक करने मैं अपना कीमती समय लगाने की आवश्यकता नही होगी और सभी कंपनिओ की यह दर आप को अब बड़ती दिखाई देगी.
मेरी नज़र मैं इस कदम के बीमा व्यावसाय पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ेंगे
१ बड़ा बीमा खरीदना मुश्किल होगा :- जी हां अब कंपनिया अपने जोखिमंकन प्रक्रिया को और अधिक कड़ा कर देंगी ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके/ अब बीमा पॉलिसी लेने से पहले आपको ज़्यादा दस्तावेज़ और कड़े मेडिकल टेस्ट से गुज़रना पड़ सकता है/
२ बीमा कंपनिओ के लाभ मैं कमी :- अधिक दावे निपटने की स्थिति मै बीमा कंपनिओ पर अधिक आर्थिक दबाव पद सकता है जो उनके लाभ पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा इससे प्रीमियम की दर बड़ेंगी और बोनस कम हो सकते हैं
३बीमा मैं धोखाधड़ी बड़ने की संभावना :- बीमा कंपनिया पहले से इस समस्या से जूझ रही हैं झुटे दावे हर साल बीमा कंपनिओ को सैकड़ों करोड़ रुपयों का नुकसान पहुचाते हैं, IRDA के इस कदम से इस प्रकार के ग़लत व झूठे दावे बड़ने की संभावना है
४ पारंपरिक बंदोबस्ती पॉलिसी बेचने पर ज़ोर :- अब बीमा कंपनिया उन उत्पादों को बेचने पर ज़्यादा ज़ोर लगाएँगी जो बीमा कंपनी के लिए कम जोखिम वाले उत्पाद हों जैसे बोनस आधारित बंदोबस्ती योजना या गारिंटीड मेचुरिटी योजना. बीमा कंपनी के लिहाज से इन उत्पादों मैं जोखिम राशि (SUM AT RISK) कम होती है अर्थात इन प्लानों मैं कंपनी को नुकसान होने की संभावना कम रहती है